बालेन्दुद्विवेदी
मैं केवल मैं हूँ — मैं जीता-जागता, चलता-फिरता व्यंग्य हूँ।
'मदारीपुर जंक्शन', 'वाया फुरसतगंज' और 'बादशाह सलामत हाज़िर हों..!' के रचयिता — श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' परंपरा को नया समकाल देने वाले उपन्यासकार, और एक पुरस्कृत लेखक-निर्देशक।

लेखक के बारे में
बालेन्दु द्विवेदी समकालीन हिंदी के एक सशक्त और बहुआयामी रचनाकार हैं। 1 दिसंबर 1975 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के ब्रह्मपुर गाँव में जन्मे बालेन्दु की रचनाशीलता की जड़ें उसी गँवई मिट्टी में हैं, जो आगे चलकर उनके कथा-संसार का सबसे जीवंत रंगमंच बनी। दर्शनशास्त्र और हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त बालेन्दु वर्तमान में उत्तर प्रदेश शासन की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। श्रीलाल शुक्ल की तरह नौकरशाही के भीतर रहते हुए उसी तंत्र और समाज पर पैनी निगाह रखना उनके लेखन का एक विशिष्ट तेवर है।
उनके पहले उपन्यास 'मदारीपुर जंक्शन' ने उन्हें हिंदी कथा-संसार में एक भरोसेमंद आवाज़ के रूप में स्थापित किया। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँव-कस्बों की जाति, सत्ता और सामाजिक विषमता को व्यंग्य और करुणा के दुर्लभ संतुलन के साथ चित्रित करने वाला यह उपन्यास 'राग दरबारी' की परंपरा में बहुप्रशंसित हुआ। इसके बाद 'वाया फुरसतगंज' और 'बादशाह सलामत हाज़िर हों..!' जैसे उपन्यासों तथा 'मृत्युभोज' जैसे नाटक ने उनकी इस पहचान को और गहरा किया।
गाँव की बोली से लेकर उर्दू की नज़ाकत तक फैली उनकी भाषा, और व्यंग्य के नीचे बहती गहरी मानवीय करुणा उनके लेखन की सबसे बड़ी ताक़त है।
उनकी लेखनी किसी एक विधा तक सीमित नहीं — उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, यात्रा-संस्मरण और जीवनी सभी में उनका विपुल लेखन है। एक ओर वे प्रेमचंद और मंटो की कहानियों का संपादन करते हैं, तो दूसरी ओर फ़ैज़, फ़राज़ और जौन एलिया जैसे शायरों पर आलोचनात्मक जीवनियाँ रचते हैं। फ़िलहाल वे लखनऊ में रहते हैं और 'मदारीपुर' त्रयी सहित कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
1 दिसंबर 1975 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के ब्रह्मपुर गाँव में जन्मे बालेन्दु — वही अंचल जो 1922 के चौरी-चौरा आंदोलन से जुड़ा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस ग्रामीण समाज में वे पले-बढ़े, उसकी बोलियाँ, लोक-परंपराएँ और सामाजिक ताना-बाना आगे चलकर उनके कथा-साहित्य का मुख्य परिवेश और विषय बने। उच्च शिक्षा उन्होंने प्रयागराज (इलाहाबाद) में पूरी की और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की; हिंदी साहित्य के इस ऐतिहासिक केंद्र के साहित्यिक-बौद्धिक वातावरण को वे अपनी संवेदना के निर्माण में निर्णायक मानते हैं।
प्रशासनिक सेवा
बालेन्दु उत्तर प्रदेश शासन की प्रांतीय सिविल सेवा (संबद्ध) में अधिकारी हैं और ज़िला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के रूप में सेवाएँ दे चुके हैं। श्रीलाल शुक्ल की भाँति, जिन्होंने प्रशासन के भीतर रहकर लिखा, वे नौकरशाही, शासन और ग्रामीण सत्ता-संरचनाओं के अपने निकट अनुभव को अपने व्यंग्य-लेखन में ढालते हैं।
साहित्यिक यात्रा
उनका पहला उपन्यास 'मदारीपुर जंक्शन' (वाणी प्रकाशन, 2017) पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक काल्पनिक गाँव-कस्बे पर आधारित व्यंग्य है, जो जातिगत संघर्ष, सामाजिक पाखंड और ग्रामीण भारत की रोज़मर्रा की राजनीति को उकेरता है। समीक्षकों ने इसे श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' का समकालीन उत्तराधिकारी माना और इसमें प्रेमचंद तथा हरिशंकर परसाई की गूँज लक्षित की। उनका दूसरा उपन्यास 'वाया फुरसतगंज' (2021) एक मामूली गाँव-घटना को राजनीतिक तमाशे में बदलते हुए समकालीन भारतीय राजनीति के अवसरवाद पर सतत व्यंग्य रचता है। उन्होंने प्रेमचंद — जिन्हें वे साहित्य की ओर अपने रुझान का निर्णायक प्रभाव मानते हैं — और सआदत हसन मंटो की चुनिंदा कहानियों का संपादन किया, मृत्युभोज की प्रथा पर नाटक 'मृत्युभोज' लिखा, तथा आलोचना-कृति 'परंपरा में जीवन की खोज' की रचना की।
सिनेमा
पटकथा-लेखक और निर्देशक के रूप में उनकी फ़ीचर फ़िल्म 'बायोस्कोप ज़िंदगी' और वृत्तचित्र — जिनमें 'काशी की मणिकर्णिका: रहस्य और मोक्ष', 'रामनामी: राम की खोज में' और 'द सेकंड सेल्फ' शामिल हैं — लोक-प्रदर्शन, धार्मिक परंपरा और उत्तर एवं मध्य भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियों से संवाद करते हैं, और अनेक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में सम्मानित हुए हैं।
शैली और सरोकार
बालेन्दु की कथा-भाषा पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोलियों और मुहावरे पर अधिकार तथा तीखे सामाजिक व्यंग्य और भीतर बहती करुणा के विशिष्ट मेल से पहचानी जाती है। आलोचकों ने बार-बार उनके लेखन को श्रीलाल शुक्ल, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई और ज्ञान चतुर्वेदी की व्यंग्य-परंपरा में रखा है। अपने कथेतर लेखन और फ़िल्मों में वे बार-बार कुछ सरोकारों की ओर लौटते हैं — उर्दू-फ़ारसी काव्य-परंपरा, हिंदी फ़िल्म-संगीत का इतिहास, धार्मिक एवं कर्मकांडीय जीवन, और उत्तर तथा मध्य भारत की लोक-आख्यान परंपराएँ।
प्रकाशित पुस्तकें
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